प्रमोशन में आरक्षण पर संग्राम, संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति ठीक नहीं : राजनाथ

10 February 2020 05:56 PM
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प्रमोशन में आरक्षण पर संसद में आज सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा भाजपा संविधान से आरक्षण को हटाना चाहती है। इसके बाद भाजपा और सरकार ने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस हमेशा संवेदनशील मामलों पर राजनीति करती है। दरअसल, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा या आरक्षण की मांग करना मौलिक अधिकार नहीं है।

राज्यसभा में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजातियों के लोगों को आरक्षण पर उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था के मुद्दे पर उच्च स्तरीय चर्चा कर रही है। मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मामले में भारत सरकार को कभी भी पक्षकार नहीं बनाया गया।

केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत ने कहा कि यह मामला पदोन्नति में आरक्षण लागू नहीं करने के उत्तराखंड सरकार के 2012 के फैसले के कारण उत्पन्न हुआ। 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस सत्ता में थी। इसके बाद कांग्रेस सदस्यों ने सदन से वॉक आउट किया।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि यह अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और कांग्रेस का ऐसे मुद्दे पर राजनीति करना ठीक नहीं है। लोकसभा में शून्यकाल के दौरान कांग्रेस और द्रमुक के सदस्यों ने सरकार पर निशाना साधते हुए उसे दलित विरोधी बताया और कहा कि उत्तराखंड सरकार द्वारा शीर्ष अदालत में पक्ष रखने जाने के बाद न्यायालय का यह फैसला आया है। विपक्षी दलों ने सरकार से शीर्ष अदालत में समीक्षा याचिका दायर करने को कहा। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि मैं कहना चाहता हूं कि 2012 में उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार थी। इतने संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस जिस तरह से राजनीति कर रही है, वह ठीक नहीं है।

सदन में लोक जनशक्ति पार्टी, जनता दल यूनाइटेड और अपना दल जैसे एनडीए के घटक दलों ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया और साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमति व्यक्त करते हुए सरकार से आरक्षण के विषय को संविधान की 9वीं अनुसूची में डालने की मांग की। जदयू के राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने कहा कि आरक्षण के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय का जो फैसला आया है, उसको लेकर पूरा सदन एकमत है। जब पूरा सदन इस विषय पर एकमत है तब इसका राजनीतिकरण ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि जब एससी, एसटी अत्याचार का विषय आया था तब भी एनडीए सरकार ने मजबूत कानून लाने का काम किया था और आगे भी सरकार इस विषय का निपटारा करेगी।

बसपा के रितेश पांडे ने कहा कि संविधान में आरक्षण का अधिकार दिया गया है। इस विषय पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से वह असहमत हैं। उन्होंने सरकार पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया। एनसीपी की सुप्रिया सुले ने कहा कि सत्ता पक्ष ने कहा है कि वह इस विषय पर कुछ कर रहे हैं, मेरा आग्रह है कि इस विषय पर जल्द ही कदम उठाया जाए।

लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन ने कहा कि उत्तराखंड सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क दिया गया कि एससी और एसटी के ऊपर जो संरक्षण है, उसे हटा देना चाहिए। अधीर रंजन ने आरोप लगाया कि आजादी के बाद से एससी और एसटी के साथ भेदभाव होता रहा है। आज सरकार उनके अधिकार को छीन रही है।

अधीर रंजन के इस बयान पर सत्ता पक्ष के सांसदों ने हंगामा किया। बीजेपी सांसदों ने कहा कि यह फैसला सरकार का नहीं, सुप्रीम कोर्ट का है। संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि इस फैसले से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

लोकसभा में लोजपा अध्यक्ष और सांसद चिराग पासवान ने कहा कि लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है, जिसमें कहा गया है कि नौकरियों और प्रमोशन के लिए आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। हम केंद्र से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हैं। चिराग पासवान ने कहा कि महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट का ही परिणाम है कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है। आरक्षण खैरात नहीं है, यह संवैधानिक अधिकार है।

अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल ने भी कहा कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है। यह अब तक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया सबसे दुर्भाग्यपूर्ण फैसला है। उन्होंने कहा कि वंचित वर्गों के अधिकारों पर इससे भयानक कुठाराघात होगा।

सदन में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद, माकपा सदस्य के के रागेश, भाकपा के विनय विश्वम और बसपा के सतीश चंद्र मिश्र ने अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों के लिए पदोन्नति में आरक्षण व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकारें नियुक्तियों में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के लिए कोटा या आरक्षण की मांग करना मौलिक अधिकार नहीं है। शुक्रवार को जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा था कि इस अदालत द्वारा निर्धारित कानून के मद्देनजर, इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है।

पीठ ने कहा, सरकारी सेवा में कुछ समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व न दिए जाने का आंकड़ा सामने लाए बिना राज्य सरकारों को ऐसे प्रावधान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि उन्हें प्रमोशन में आरक्षण देना है या नहीं? कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाया था। पीठ ने ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि राज्य सरकार आरक्षण देने को प्रतिबद्ध नहीं है। लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा इसको लेकर दावा करना मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है और न ही इस संबंध में कोर्ट राज्य सरकार को कोई आदेश जारी कर सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा, अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-ए) आरक्षण लागू करने की शक्ति जरूर देता है, लेकिन यह तभी हो सकता है जब राज्य सरकार यह मानती हो कि सरकारी सेवाओं में कुछ समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा 2012 में दिया गया फैसला निष्प्रभावी हो गया, जिसमें विशेष समुदायों को कोटा प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को आदेश दिया गया था।


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